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प्रेम



: प्रेम : 

प्रेम मनुष्य का निर्धारित लक्ष्य है। कम्पन और कम्पन में सुख, प्यास और तृप्ति-प्रेम का क्षेत्र यही है। जीवन में प्रेम प्रधान जीवन है। जीवन में आवश्यक है कि एक-दूसरे की आत्मा को अच्छी तरह से जान लेना,-एक-दूसरे से प्रगाढ़ सहानुभूति और एक-दूसरे के अस्तित्व को एक कर देना ही प्रेम है, जीवन का सर्वसुन्दर लक्ष्य है। प्रेम के सन्दर्भ में विपरीतलिंगी प्रेम यानी स्त्री-पुरुश अथवा लड़की-लड़का के प्रेम को समाज बंद-खुले विभिन्न नज़रिए से देखता है। दरअसल, स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध केवल संसार में ही होता है। संसार से पृथक् दोनों ही भिन्न-भिन्न आत्माएँ हैं। संसार में भी स्त्री और पुरुष में आत्मा का ऐक्य संभव नहीं है। प्रेम तो केवल आत्मा की घनिष्ठता है। वह घनिष्ठता कोई बड़े महत्त्व की वस्तु नहीं होती, वह टूट भी सकती है। इसीलिए कहा गया है कि उस घनिष्ठता के टूटने पर अपने जीवन को दुखमय बना लेना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। 

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