Skip to main content

अरुण हिंदी-शब्दकोश : शब्दार्थ से साक्षात्कार

------------- 
राजीव रंजन प्रसाद

यह मैंने एक फ़ितूर के तहत शुरू किया। कोई शब्द मिलता और उसके बारे में लिखा भी। झट नोट कर लेता। यह शौक धीरे-धीरे दस्तावेज की शक़्ल अख़्तियार कर ली। प्रकाशन संभव नहीं था। क्योंकि यह मेरा कोई मौलिक लेखन नहीं था। हाँ, उसे अपनी भाषा में अपने अनुसार व्यवस्थित कर दिया था मात्र। साथ के लोगों में इसको लेकर कोई दिलचस्पी नहीं थी तो मेरे प्राध्यापकों में भी इसमें कोई नई बात नहीं दिखी। लोग इसके महत्त्व को इसलिए भी नहीं समझ रहे थे क्योंकि मैंने इसे कोई अकादमिक-परियोजना के अन्तर्गत करना नहीं शुरू किया था।

यकायक ध्यान में आया कि हूँ तो मैं एक अध्यापक; क्यों न अपने ब्लाॅग पर इसका डिजिटल संस्करण बनाकर संजो लूँ। भविष्य में साथीजन प्रोत्साहित करेंगे या उनका सकारात्मक प्रत्युत्तर मिलेगा तो और जीजान से जुटकर इसे करता जाऊँगा। वैसे भी कितने पन्ने बनारस से अरुणाचल आने के क्रम में इधर-उधर हो गए। अब जो बचे हैं उन्हें बचा लेना ही उपयुक्त है। इसी क्रम में यह नाम जे़हन में-‘अरुण हिंदी शब्दकोश’। यानी अरुणाचल प्रदेश के हिन्दी-मित्रों के लिए सहज सरल ढंग से शब्दार्थों का उल्लेख, मूल्यांकन और परिभाषा की प्रस्तुति। 

इसमें एक बात की छूट ली जाएगी कि किसी भी शब्द को बाद में कभी भी ‘माॅडरेट’ किया जा सकेगा। सुधार, संसोधन एवं परिष्कार के बाद अंततः ‘अरुण हिंदी शब्दकोश’ का जो कलेवर और संयोजन होगा, उससे मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी। 

अतः आपसबों का अमूल्य सहयोग अपेक्षित है।

सादर,

भवदीय

राजीव रंजन प्रसाद
सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग
राजीव गाँधी विश्वविद्याालय
रोनो हिल्स, दोईमुख
अरुणाचल प्रदेश-791112
मो. 9436848281
ई.मेल: rrprgu@gmail.com

Comments

Popular posts from this blog

पूँजीवादी आधिपत्य

----------- अरुण हिंदी शब्दकोश : पूँजीवादी आधिपत्य : जीवित रहने के लिए मनुष्य खाने-पीने की चीजें पैदा करते हैं; पहनने के लिए कपड़े बनाते हैं, रहने के लिए घर बनाते हैं। इस क्रम में वे आपस में उत्पादन का सम्बन्ध कायम करते हैं। भारत में लोक की भूमिका निर्णायक थी जो सभी को आपसी सामंजस्य और संतुलन के साथ गुजर-बसर करने की अनुमति प्रदान करता था। बाद में औद्योगिक पूँजीवाद ने लोक-संस्कृति अथवा ग्राम-स्वराज की सार्वभौम धारणा को खंडित कर दिया। उसने औद्योगि पूँजीवाद की जो अवधारणा रखी उसमें बड़ा पूँजीपति छोटे पूँजीपति को खा जाता है। वह मजदूरों की श्रम-शक्ति का ही अपहरण नहीं करता, वरन् छोटे पूँजीपतियों का, उनके व्यवसाय का, अपहरण भी करता है। वर्तमान में पूँजी का केन्द्रीकरण जिस खतरनाक तरीके से हो रहा है, भयावह है। यह पूँजीवादी आधिपत्य की नई स्थिति है जिसमें बाज़ार पूँजीकरण के सहारे वैश्विक कब्जे की तैयारी अन्दर ही अन्दर की जाती है। पूँजीपति जो काम करते हैं वह यह है कि उत्पादन के साधनों में तेजी से तरक्की करते हैं। इस तरह वे बड़े पैमाने पर बिकाऊ माल पैदा करते हैं। इस बिकाऊ माल से पिछड़े हुए दे...

धर्म

----------- अरुण हिंदी शब्दकोश : धर्म :  सामाजिक विकास की एक मंजिल में नीतिशास्त्र, दर्शन, राजनीति, इतिहास, काव्य आदि अलग-अलग विषय नहीं होते, वे सब एक ही लिखित अथवा मौखिक वाङ्मय के अन्तर्गत होते हैं और उसे धर्म कहा जाता है। संसार के बारे में मनुष्य जो कुछ सोचता-समझता है, उसे वह अपने धर्म नामक विश्वकोश में एकत्र करता जाता है। यदि भाषाविज्ञान से लेकर दर्शनशास्त्र तक मानव-जाति के इतिहास को, ज्ञान के विकास को समझने की स्रोत-सामग्री विद्वानों को धर्मग्रंथों में मिली है, तो यह स्वाभाविक है। मनुष्य किसी युग-विशेष में, किसी समाज-विशेष में रहता है। अतः देशकाल से परे कोई अमूर्त मानव-तत्त्व नहीं है। धर्म में जो अतिकल्पना (फैंटेसी) है, वह इस संसार को ही प्रतिबिम्बित करती है, किन्तु वह संसार को प्रत्यावर्तित रूप में दिखाती है, वह जैसा है, वैसा नहीं दिखाती है। दुनिया भर में धर्म कम निजी और ज्यादा से ज्यादा सार्वजनिक दायरे में दृश्य होते जा रहे हैं तथा मेडिकल, शोध, महिलाओं के प्रजनन विकल्पों, यौनिकता, पर्यावरण, आतंकवाद, सशस्त्र संघर्षों से लेकर हर चीज से जुड़ी नीतियों पर प्रभावी होते जा...

प्रेम

--------- अरुण हिंदी शब्दकोश : प्रेम :   प्रेम मनुष्य का निर्धारित लक्ष्य है। कम्पन और कम्पन में सुख, प्यास और तृप्ति-प्रेम का क्षेत्र यही है। जीवन में प्रेम प्रधान जीवन है। जीवन में आवश्यक है कि एक-दूसरे की आत्मा को अच्छी तरह से जान लेना,-एक-दूसरे से प्रगाढ़ सहानुभूति और एक-दूसरे के अस्तित्व को एक कर देना ही प्रेम है, जीवन का सर्वसुन्दर लक्ष्य है। प्रेम के सन्दर्भ में विपरीतलिंगी प्रेम यानी स्त्री-पुरुश अथवा लड़की-लड़का के प्रेम को समाज बंद-खुले विभिन्न नज़रिए से देखता है। दरअसल, स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध केवल संसार में ही होता है। संसार से पृथक् दोनों ही भिन्न-भिन्न आत्माएँ हैं। संसार में भी स्त्री और पुरुष में आत्मा का ऐक्य संभव नहीं है। प्रेम तो केवल आत्मा की घनिष्ठता है। वह घनिष्ठता कोई बड़े महत्त्व की वस्तु नहीं होती, वह टूट भी सकती है। इसीलिए कहा गया है कि उस घनिष्ठता के टूटने पर अपने जीवन को दुखमय बना लेना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है।